" ज्योतिष एवं वास्तु से सम्बंधित इस ब्लॉग पर आपको ' आचार्य रंजन ' का नमस्कार !! "

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Tuesday, January 26, 2010

* शरीर के अंगों पर ग्रहों का प्रभाव *

- आचार्य  रंजन  
( ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु  विशेषज्ञ  सह  निदेशक ' महर्षि  भृगु  ज्योतिष  संस्थान )
     हमारे  शरीर  का  प्रत्येक   अंग  पर  हमारे  सौर  मंडल  के  विभिन्न  ग्रहों  का  प्रभाव  पड़ता  है . आपको  यह  जानकर  आश्चर्य   हो  सकता  है  कि   हमारे  शरीर  के  अलग  अलग  भागों  पर  अलग  अलग  ग्रहों  का  नियंत्रण / प्रभाव  होता   है  , दूसरे  शब्दों  में  हम  /  आप  किसी  भी  व्यक्ति  के  केवल  शरीर  के  जिस  भाग  में  व्यक्ति  रोग  से  पीड़ित  होता  है  सिर्फ  उस  भाग  का  पता  कर  आप  जान  सकते  हैं  कि  उनकी  कुंडली  में  कौन   सा  ग्रह  गड़बड़  है  और  कौन   सा ठीक !

कारक   ग्रह   --      शरीर  के  प्रभावित  अंग 
*  सूर्य          -   सिर  से  मुख   तक 
*  चन्द्र         -   गले  से  ह्रदय  तक 
*  मंगल       -   पेट  से  पीठ    तक 
*  बुध          -   हाथ  और  पाँव  पर 
*  गुरु          -   कमर  से  जांघ  तक 
*  शुक्र         -   गुप्तांग  से  वृष्ण  तक 
*  शनि        -   घुटनों  से  पिंडली  तक  
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    कुंडली  में  ग्रहों  कि शुभाशुभ   स्थिति  के  अनुसार  मनुष्य  शरीर  के  अंग   पुष्टापुष्ट  होंगे  !  
*** नोट  : अपने  कुंडली  में  देखकर  या  उपरोक्त  शरीर  के  अंगों   में  हो रहे  परेशानी  का  समाधान  हेतु  आप  उपाय   स्वतः  प्रारंभ  कर  सकते  हैं  ! ***

Friday, August 14, 2009

* पंचांग ...???????????? *


~आचार्य रंजन
पंचांग भारतीय - ज्योतिष का दर्पण माना जाता है । समय की विभिन्न इकाईयों संवत् , मास , पक्ष , तिथि , वारादि विधाओं में अभिव्यक्त करने का पंचांग एक मात्र सशक्त माध्यम है ।
प्राचीन काल में वैदिक , स्मार्त एवं गृहस्थी के सभी धार्मिक एवं सांकल्पिक अनुष्ठान आदि कृत्यों का मार्गदर्शन पंचांग के तिथ्यादी अंगों के द्वारा ही सिद्ध हुआ माना जाता था । इसी कारण काल रुपी ईश्वर के अंगभूत पंचांग ( तिथि , वार , नक्षत्र , योग एवं कारण )को नमस्कार किया जाता था । कृषि , व्यापार , होम - यज्ञादि , धार्मिक अनुष्ठानों को प्रारम्भ करने का काल का ज्ञान पंचांग द्वारा ही किया जाता रहा है । प्राचीन काल में पंचांग के पाँच अंग - १ तिथि , २ वार , ३ नक्षत्र , ४ योग , व ५ करण ही आवश्यक अंग माने जाते थे , परन्तु कालांतर एवं अर्वाचीन काल से पंचांग के आधुनिक स्वरुप में दैनिक ग्रह संचार एवं राशिः परिवर्तन , ग्रहण - विवरण , राशिफल , पर्व - त्योहार निर्णय , विवाह , मुंडन , गृह प्रवेश , गृह निर्माण , विपणि आदि मुहूर्त , भविष्यवानियाँ आदि विविध विषयों का समावेश किया जाने लगा है ।
note : " प्रत्येक प्रमाणिक पंचांग किसी स्थान - विशेष के अक्षांश - रेखांश पर आधारित होता है । उसमें स्थानीय सूर्योदय , सूर्यास्त , तिथि - वार - नक्षत्र - योगादि के घड़ी पल स्थानीय सूर्योदय के अनुशार दिए रहते हैं , परन्तु जहाँ तिथि , नक्षत्र एवं योगों आदि का मान घंटे - मिनटों में दिए गए हैं , वह भारतीय स्टैण्डर्ड टाइम के होने के कारण अखिल भारतोप्योगी होते हैं । "

Wednesday, August 12, 2009

* क्या होता है अधिक मास एवं क्षय मास ...*


-आचार्य रंजन
सौर -वर्ष और चांद्र -वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिए हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चान्द्रमास की वृद्धी कर दी जाती है । इसी को " अधिक मास " कहते हैं ।
सौर - वर्ष का मान ३६५ दिन , १५ घड़ी , २२ पल और ५७ विपल हैं । जबकि चांद्रवर्ष ३५४ दिन , २२ घड़ी , १ पल और २३ विपल का होता है । इस प्रकार दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष १० दिन , ५३ घटी , २१ पल ( अर्थात लगभग ११ दिन ) का अन्तर पड़ता है । इस अन्तर में समानता लाने के लिए चांद्रवर्ष १२ मासों के स्थान पर १३ मास का हो जाता है ।
वास्तव में यह स्थिति स्वयं ही उत्त्पन्न हो जाती है , क्योंकि जिस चंद्रमास में सूर्य - संक्रांति नहीं पड़ती , उसी को " अधिक मास " की संज्ञा दे दी जाती है तथा जिस चंद्रमास में दो सूर्य संक्रांति का समावेश हो जाय , वह " क्षयमास " कहलाता है ।
क्षय -मास केवल कार्तिक , मार्ग व पौस मासों में होता है । जिस वर्ष क्षय-मास पड़ता है , उसी वर्ष अधि-मास भी अवश्य पड़ता है परन्तु यह स्थिति १९ वर्षों या १४१ वर्षों के पश्चात् आती है । जैसे विक्रमी संवत २०२० एवं २०३९ में क्षय - मासों का आगमन हुआ तथा भविष्य में संवत २०५८ , २१५० में पड़ने की संभावना है ।
नोट : क्षय एवं अधिक मासों में विवाह , यज्ञ , मुंडन - आदि शुभ कृत्यों का प्रारम्भ करना निषेध माना जाता है ।

Thursday, April 23, 2009

* ज्योतिष के सन्दर्भ में :

आचार्य रंजन
(Astrologer & Vaastu Specialist),Begusarai

" ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान से मनुष्य को श्रेष्ठ लाभ यह है की उसे पूर्वजन्म के शुभाशुभ कर्मो का ज्ञान ,वर्तमान जन्म में शुभकर्म करने की आवश्यकता , मानविय जन्म का उद्देश्य , ईश्वरीय व मानवीय शक्ति में अन्तर , कर्म और भोग की मर्यादा , प्रारब्ध और प्रयत्न की सीमा व दोनों का परस्पर सम्बन्ध , अनुकूल व प्रतिकूल समय का ज्ञान व संकट समय मन में धैर्य रख उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति प्राप्त होती है । इस शक्ति से मन में संतोष , संतोष से चिंता का नाश ,चिंता-नाश से धर्म की प्राप्ति ,धर्म से धैर्य व शक्ति की प्राप्ति और शक्ति से ईश्वर के प्रति भक्ति व विश्वास क्रमशः प्राप्त करते हुए व सांसारिक आपत्तियों को सहर्ष स्वीकार करने की क्षमता प्राप्त होती है । "

* नवग्रह शांति के अचूक उपाय *



प्रयोग विधि :-

निम्न सामग्री को लेकर लगभग 8-10 लीटर पानी में डालकर खूब उबाल लें (लगभग १ घंटा ) । फिर इस पानी को रात भर ठंडा होने के लिए छोड़ दे । अगले दिन जब आप स्नान करने जाएँ तो इस liquid को छान कर किसी बर्तन में लगभग 2 ग्लास के आसपास निकाल कर ले जाये फिर जब आपका स्नान समाप्त हो जाये तो अंत में लगभग एक बाल्टी सादा पानी में इस liquid को मिलाकर खूब अच्छी तरह से स्नान करे , फिर देखें इसका चमत्कार !


सामग्री :-
१) कच्चा चावल (अरवा चावल ) :- १०० ग्राम
२) सरसों :- १०० ग्राम
३) नागरमोथा :- १०० ग्राम
४) सुखा आंवला :- १०० ग्राम
५) हल्दी (गाँठ वाली ) :- ५० ग्राम
६) ढुबी (दूब घास ) :- १०० ग्राम लगभग
७) तुलसी पत्र :- ५१ से १०८ पत्ता
८) बेलपत्र :- ५१ से १०८ पत्ता ( ३-३ पत्तों वाला )



लाभ :-
* कोई भी इंसान कितना ही tension में क्यों न हो ?कोई भी कार्य यदि विफल हो रहा हो !उपरोक्त प्रयोग प्रतेक मनुष्य को शारीरिक , मानसिक एवं आर्थिक रूप में तुंरत लाभ प्रदान करता है ।
*यदि किसी भी ग्रह का कोई विशिस्ट अनुष्ठान करने का कोई सलाह दिए हो और उसे करने में आप असमर्थता अनुभव कर रहे हो तो भी ऊपर लिखे प्रयोग कर आप तुंरत लाभान्वित हो सकते है -- आचार्य रंजन
नोट :- प्रयोग के दोरान किसी भी शंका का समाधान हेतु आप हमसे किसी भी समय मुफ्त सलाह ले सकते है ।
- Aacharya Ranjan
(Astrologer & Vaastu Specialist)






नवरत्न एवं उसके समतुल्य प्रभाव प्रदान करने वाले वनस्पतियाँ ** -Aacharya Ranjan


ग्रह - रत्न - वनस्पति - दिन
सूर्य - मानिक (Ruby) - बेल का जड़ - रविवार
चंद्रमा - मोती (Pearl) - खिरनी का जड़ - सोमवार
मंगल - मूंगा (Coral) - अनंतमूल का जड़ - मंगलवार
बुध - पन्ना(Emarald) - विधारा का जड़ - बुधवार
बृहस्पति - पुखराज(Topaz) - केला का जड़ - गुरुवार
शुक्र - हीरा (Diamond) - शर्पुन्खा का जड़ - शुक्रवार
शनि - नीलम (Blue Shapphire) - बिच्छु का जड़ - शनिवार
राहू - गोमेदGomed ) - श्वेत चन्दन का जड़ - शनिवार
केतु - लहसुनिया (Cats Eye) - अश्वगंधा का जड़ - बुधवार

नोट :- वनस्पति धारण करने से पूर्ब समय की जानकारी हेतु पहले संपर्क कर ले । -आचार्य रंजन (ज्योतिषी & वास्तु विशेषज्ञ )

Wednesday, March 18, 2009

* अंग्रेजी तिथि के अनुसार सूर्य की राशि जानें :*

SUN IN THE RASHI (In every year):

मेष : 14th अप्रैल - 13th मई
वृष : 14th मई - 13th जून
मिथुन : 14th जून - 13th जुलाई
कर्क : 14th जुलाई - 13th अगस्त
सिंह : 14th अगस्त - 13th सितम्बर
कन्या : 14th सितम्बर - 13th अक्टूबर
तुला : 14th अक्टूबर - 13th नवम्बर
वृश्चिक : 14th नवम्बर - 13th दिसम्बर
धनु : 14th दिसम्बर - 13th जनवरी
मकर : 14th जनवरी - 13th फ़रवरी
कुम्भ : 14th फ़रवरी - 13th मार्च
मीन : 14th मार्च - 13th अप्रैल
- आचार्य रंजन



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