" ज्योतिष एवं वास्तु से सम्बंधित इस ब्लॉग पर आपको ' आचार्य रंजन ' का नमस्कार !! "

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Thursday, August 13, 2009

* भद्रा - एक परिचय *

" विष्टि " नामक करण ( तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं ) को ही भद्रा कहते हैंभद्राकाल में विवाह , मुंडन , गृहारंभ , यज्ञोपवित , रक्षाबंधन , नवीन व्यवसाय आदि शुभ कार्यों का प्रारम्भ करना वर्जित माना जाता हैपरन्तु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन , यज्ञ करना , ऑपरेशन , मुकदमा करना इत्यादि सम्बंधित कृत्य करने प्रशस्त मने जाते हैं
एक पक्ष में लगभग बार भद्रा की आवृति होती है
शुक्ल - पक्ष की अष्टमी और पूर्णिमा तिथि के पूर्वार्ध में तथा चतुर्थी एवं एकादशी तिथि के उत्तरार्ध में भद्रा होती है , जबकि कृष्णपक्ष की तृतीया और दशमी तिथि के उत्तरार्ध में तथा सप्तमी एवं चतुर्दशी तिथि के पूर्वार्ध में भद्रा की व्याप्ति रहती है
नोट : प्रायः सभी पंचांगों में भद्रा का प्रारम्भ एवं अंत दिया रहता है - आचार्य रंजन , बेगुसराय , बिहार

Monday, August 10, 2009

* बच्चों के नामकरण का मूल आधार नक्षत्र *

-आचार्य रंजन
किसी बालक या बालिका का नामकरण बच्चे के जन्म नक्षत्र एवं उसके चरनानुसार रखने की परिपाटी भारत-वर्ष में रहा है । नक्षत्रों के चरण भी हिंदी वर्णमाला के अनुसार ही अभिव्यक्त किये जाते हैं , अर्थात नक्षत्र के जिस चरण पर बच्चे का जन्म होगा , उसी के अनुसार उसका नाम रखा जाता है ।

# नक्षत्र के चरनानुसार वर्णाक्षर #

१ -अश्वनी ----(मेष ) चू , चे , चो , ला

२- भरणी ----ली , लू , ले , लो

३- कृतिका ---अ ,(वृष ) इ, उ , ऐ

४- रोहिणी ---ओ , वा , वी , वू

५- मृगशिरा ---वे , वो ,(मिथुन ) का , की

६- आर्द्रा ---कू , घ , ङः , छ

७- पुनर्वसु ---के , को , ह , (कर्क ) हि

८- पुष्य ---हु , हे , हो , डा

९- आश्लेषा ---डी , डू , डे , डो

१०- मघा ---(सिंह) मा , मी , मू , मे

११- पूर्व-फाल्गुनी ----मो , टा , टी , टू

१२- उत्तरा-फाल्गुनी --टे , (कन्या ) टा , पा , पी

१३- हस्त ---पू , षा , ण , ठ

१४- चित्रा ----पे , पो , (तुला) रा , री

१५- स्वाति ----रू , रे , रो , ता

१६- विशाखा ----ती , तू , ते , (वृश्चिक ) तो

१७- अनुराधा ----ना , नी , नू , ने

१८- ज्येष्ठा ----नो , या , यी , यूं

१९- मूला ----(धनु) ये , यो , भा , भी

२०- पूर्वा-सादा ----भू , ध , फ , ढ

२१- उत्तरा-सादा ----भे , (मकर ) भो , जा , जी

२२- श्रवण ----खी , खू , खे , खो

२३- धनिष्ठा ----ग , गी , (कुम्भ ) गू , गे

२४- शतभिषा ----गो , सा , सी , सू

२५- पूर्वा -भाद्रपद --से , सो , दा , (मीन ) दी

२६- उत्तरा-भाद्रपद ---दू , थ , झ् , ञों

२७- रेवती ----दे , दो , चा , ची

नोट : किसी भी तरह के अस्मंजश्ता की स्थिति में निःसंकोच संपर्क कर सकते हैं ।

Sunday, August 9, 2009

* नक्षत्र एवं नक्षत्र का स्वरुप *

आकाश मंडल एवं भचक्र में असंख्य तारे हैं , जो कुछ विशेष प्रकार की आकृतियाँ बनाते दिखाई देते हैं । जैसे - अश्व , शकट , सर्प , हाथ , चक्र , त्रिकोण इत्यादि । हमारे भारतीय ज्योतिषाचार्यों द्वारा ताराओं की इन्हीं आकृति - विशेष के आधार पर उनके समूह को जिसे हम "नक्षत्र " कहते हैं , का नाम रखा गया है ।

नीचे हम नक्षत्रों के नाम तथा आकाश-मंडल में उनका स्वरुप तथा दिशा (जिधर वे अवाश्थित हैं ) की जानकारी दे रहे हैं ---

नक्षत्रों के नाम- नक्षत्रों के स्वरुप- दिशा(आकाश में)

***************************************************

१- अश्वनी --- अश्वमुख के समान ---उत्तर

२- भरनी --- योनी के समान ---उत्तर

३- कृतिका ---छुरे के समान ---मध्य

४- रोहिणी ---शकट के समान ---मध्य

५.- मृगशिरा--हिरन मुख के समान -दक्षिण

६- आर्द्रा ---मणि के समान --- दक्षिण

७ - पुनर्वसु ---गृह के समान --- दक्षिण

- पुष्य ---वन के समान ---मध्य

९- आश्लेषा ---चक्र के समान ---मध्य

१०- मघा ---भवन के समान ---उत्तर

११- पूर्व-फाल्गुनी -चारपाई के समान--उत्तर

१२- उत्तरा-फाल्गुनी -शय्या के समान -उत्तर

१३- हस्त ---हाथ के समान ---दक्षिण

१४- चित्रा ---मोती के समान ---मध्य

१५- स्वाति ---मूंगे के समान ---उत्तर

१६- विशाखा ---तोरण के समान --- उत्तर

१७- अनुराधा ---चावल के समान ---दक्षिण

१८- ज्येष्ठा ---कुंडल के समान ---दक्षिण

१९- मूला ---सिंह के पूँछ के समान-दक्षिण

२०- पूर्वा-सादा -हाथी के दंत के समान-दक्षिण

२१- उत्तरा-सादा -मंच के समान ---दक्षिण

२२- श्रवण ---वामन के ३चरण के समान- मध्य

२३- धनिष्ठा --मृदंग के समान ---मध्य

२४- शतभिषा -वृत्त के समान ---मध्य

२५- पूर्वा -भाद्रपद -मंच के समान ---उत्तर

२६- उत्तरा-भाद्रपद -युगल तारे के समान --उत्तर

२७- रेवती ---मृदंग माला के समान --मध्य

********************आचार्य रंजन (ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु विशेषज्ञ )

Friday, August 7, 2009

* नक्षत्र एवं उसके स्वामी-ग्रह *

एक अथवा अनेक दैदीप्यमान तारा समूह को " नक्षत्र " (Constellation) कहते हैं । आकाश-मंडल में कूल २७ नक्षत्र हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं ---
* नक्षत्रों के नाम --------- स्वामी ग्रह *
**********************************

१ - अश्वनी - केतु

२ - भरनी - शुक्र

३ - कृतिका - सूर्य

४ - रोहिणी - चंद्रमा

५ - मृगशिरा - मंगल

- आर्द्रा - राहू

७ - पुनर्वसु - गुरु

८ - पुष्य - शनि

९ - आश्लेषा - बुध

१० - मघा - केतु

११ - पूर्व-फाल्गुनी - शुक्र

१२ - उत्तरा-फाल्गुनी - सूर्य

१३ - हस्त - चन्द्र

१४ - चित्रा - मंगल

१५ - स्वाति - राहू

१६ - विशाखा - गुरु

१७ - अनुराधा - शनि

१८ - ज्येष्ठा - बुध

१९ - मूला - केतु

२० - पूर्वा-सादा - शुक्र

२१ - उत्तरा-सादा - सूर्य

२२ - श्रवण - चन्द्र

२३ - धनिष्ठा - मंगल

२४ - शतभिषा - राहू

२५ - पूर्वा -भाद्रपद - गुरु

२६ - उत्तरा-भाद्रपद - शनि

२७ - रेवती - बुध

- आचार्य रंजन (ज्योतिषाचार्य & वास्तु विशेषज्ञ ), बेगुसराय, बिहार

*गण्डमूल या सताईशा नक्षत्र *

- आचार्य रंजन , बेगुसराय,बिहार
रेवती , अश्विनी , आश्लेषा , मघा , ज्येष्ठा तथा मूला - ये "गण्डमूल- नक्षत्र " या "सताईशा नक्षत्र " कहलाते हैं । इन नक्षत्रों के विशेष चरण में उत्पन्न बालक / बालिका स्वयं अपने या माता - पिता के स्वास्थ्य , व्यवसाय एवं उन्नति आदि के सम्बन्ध में अशुभ होते हैं ।
गण्डमूल -नक्षत्र में उत्पन्न जातक के नक्षत्र की लगभग 27 दिन पश्चात उसी नक्षत्र में विद्वान् एवं योग्य ब्रह्मण द्वारा शांति करवानी चाहिए । यदि जन्म-काल के समय शांति न करवाई गयी हो तो , जातक के जन्म-दिन के निकट उसी नक्षत्र में दान-पूजन करवा लेना शुभ-कारक रहता है ।

Sunday, March 1, 2009

नक्षत्र वास्तु के यथार्थ को आत्मसात कर सुखमय जीवन जीना सीखें



ज्योतिष आपके जीवन के मार्ग को सुगम बनाती है एवं वास्तु द्बारा निर्मित भवन आपको सुख,शान्ति और समृद्धि प्रदान करती है।
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