* इस प्रकार के शंख में जल भरकर मस्तक पर रोज छिरकने से पाप का नाश होता है ...
* शंख में जल भरकर पूजन करने से लक्ष्मी प्रसन्न होती है ..
* यदि इस प्रकार का शंख घर में होता है तो किसी प्रकार का रोग या संकट घर में नहीं व्याप्त होता है , ऐसी मान्यता है ....
* यदि इस शंख के सामने नित्य अगरवत्ती लगाई जाय तो उस व्यक्ति कि समाज में प्रतिष्ठा बढती है , राज्य में सम्मान होता है तथा व्यापार में वृद्धि होती है ....
* जिसके घर में ऐसा शंख होता है उसके घर में अक्षय भण्डार बना रहता है .......- आचार्य रंजन , बेगुसराय
NOTE : अन्य महत्वपूर्ण टिप्स.. हेतु आप * यहाँ * क्लिक करें ...
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Monday, October 19, 2009
~ दक्षिणावर्त - शंख के प्रभाव ~
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Labels: वास्तुWednesday, May 20, 2009
* वास्तु के वैज्ञानिक आधार *
आदिकाल से हिन्दू धर्म ग्रंथों में चुम्बकीय प्रवाहों , दिशाओं , वायु प्रवाह एवं गुरुय्वाकर्षण के नियमों को ध्यान में रखते हुए वास्तुशास्त्र की रचना की गयी तथा यह पाया गया की इन नियमों का पालन करने से मनुष्य के जीवन में शुख ,शांति एवं धन-धान्य की वृद्धि होती है ।
वास्तु वस्तुतः पृथ्वी , जल , आकाश ,वायु और अग्नि इन पञ्च-तत्वों के समानुपातिक सम्मिश्रण का नाम है । इसके सही सम्मिश्रण से ' बायो-इलैक्ट्रिक-मग्नेटिक-एनर्जी 'की उत्त्पत्ति होती है , जिससे मनुष्य को उत्तम स्वास्थ्य ,शांति , धन एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ।
भूलोक में समस्त जीवों ,पेड़-पौधों के जीवन का आधार सूर्य है अर्थात सूर्य सभी प्राणियों के प्राणों का श्रोत है यही सूर्य जब उदित होता है तब सम्पूर्ण संसार में प्राणाग्नि का संचार आरम्भ होता है , क्योंकि सूर्य की रश्मियों में सभी रोगों को नष्ट करने की शक्ति मौजूद है , इसलिए भवन निर्माण में सूर्य-उर्जा , वायु-उर्जा , चंद्र-उर्जा आदि का प्रभाव प्रमुख माना जाता है ।
मनुष्य को मकान इस प्रकार से बनाना चाहिए जो प्राकृतिक व्यवस्था के अनुरूप हों ताकि वह प्राकृतिक उर्जा श्रोतों का इस्तमाल ज्यादा से ज्यादा कर अपना एवं समाज का कल्याण कर सके ।
पूर्व में उदित होनेवाले सूर्य की किरणों का प्रवेश भवन के प्रत्येक भाग में होना चाहिए ताकि मनुष्य उर्जा को प्राप्त कर सके क्योंकि सूर्य की प्रातः कालीन किरणों में विटामिन डी का बहुमूल्य श्रोत होता है जिसका प्रभाव हमारे शारीर पर रक्त के माध्यम से सीधा पड़ता है । इसी तरह मध्याह्न के पश्चात सूर्य की किरणे रेडियो-धर्मिता से ग्रस्त होने के कारण शरीर पर विपरीत प्रभाव डालती है । इसलिए भवन-निर्माण करते समय भवन का ओरीएँ टेसन इस प्रकार से रखा जाना चाहिए जिससे मध्यंत सूर्य की किरणों का प्रभाव शारीर पर कम से कम पड़े ।
दक्षिण-पश्चिम भाग के अनुपात में भवन-निर्माण करते समय पूर्व एवं उत्तर के अनुपात की सतह को इसलिए नीचा रखा जाता है क्योंकि इसका मुख्या उद्देश्य सूर्य की किरणों में प्रातः काल के समय विटामिन डी ,एफ एवं विटामिन A रहता है और इसके निचे रहने से प्रातःकालीन सूर्य की किरणों का लाभ पूरे भवन को प्राप्त होता रहेगा ।
दक्षिण-पश्चिम भाग में भवन को अधिक ऊंचा बनाने तथा मोटी दीवार बनाने का तथा सीढियों आदि का भार भी इसी दिशा में रखना , भारी मशीनरी , भारी सामान का स्टोर आदि भी बनाने का प्रमुख कारण यह है की जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा दक्षिणी दिशा में करती है तो वह एक विशेष कोणीय स्थिति में होती है । अतः इस क्षेत्र में अधिक भार रखने से संतुलन आ जाता है तथा सूर्य की गर्मी इस भाग में होने के कारण सूर्य की गर्मी से भी बचा जा सकता है गर्मी में इस क्षेत्र में ठंढक .तथा
सर्दी में गर्मी का अनुभव भी किया जा सकता है ।
आग्नेय (दक्षिण-पूर्वी ) कोण में रसोई बनाने का प्रमुख कारण यह है , क्योंकि
सुबह में पूर्व से सूर्य की किरणें विटामिन युक्त होकर दक्षिणी क्षेत्र की वायु के साथ प्रवेश करती है , क्योंकि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा दक्षिणायन की ओ़र करती है । अतः आग्नेयकों की स्थिति में इस भाग को अधिक सूर्य की किरणें विटामिन एफ एवं डी से युक्त अधिक समय तक मिलती रहे तो रसोई में रखे खाद्य पदार्थ शुद्ध होते रहेंगे और इसके साथ साथ सूर्य की गर्मी से पश्चिमी दिवार की नमी के कारण विद्यमान हानिकारक कीटाणु नष्ट होते रहते हैं ।
सुबह में पूर्व से सूर्य की किरणें विटामिन युक्त होकर दक्षिणी क्षेत्र की वायु के साथ प्रवेश करती है , क्योंकि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा दक्षिणायन की ओ़र करती है । अतः आग्नेयकों की स्थिति में इस भाग को अधिक सूर्य की किरणें विटामिन एफ एवं डी से युक्त अधिक समय तक मिलती रहे तो रसोई में रखे खाद्य पदार्थ शुद्ध होते रहेंगे और इसके साथ साथ सूर्य की गर्मी से पश्चिमी दिवार की नमी के कारण विद्यमान हानिकारक कीटाणु नष्ट होते रहते हैं ।
उत्तरी-पूर्वी भाग अर्थात ईशान कोण में आराधना - स्थल या पूजा-स्थल रखने का प्रमुख कारण यह है की पूजा करते समय मनुष्य के शारीर पर अधिक वस्त्र न रहने के कारण प्रातः कालीन सूर्य की किरणों के माध्यम से शारीर में विटामिन 'डी' नैसर्गिक अवस्था में प्राप्त हो जाती है और उत्तरी क्षेत्र से पृथ्वी की चुम्बकीय उर्जा का अनुकूलन प्रभाव भी पवित्र माना जाता है ,अतः अन्तरिक्ष से हमें कुछ अलौकिक शक्ति मिलती रहे इसलिए इस क्षेत्र को अधिक खुला भी रखा जाता है । उत्तर - पूर्व में आने वाले पानी के श्रोत का प्रमुख आधार यह है की पानी में प्रदुषण जल्दी लगता है और पूर्व से ही सूर्य उदय होने के कारण सूर्य की किरणे जल पर पड़ती है, जिसके कारण इलेक्ट्रो - मग्नेटिक - सिद्धांत के द्वारा जल को सूर्य से ताप प्राप्त होता है और उसी के कारण जल शुद्ध रहता है । दक्षिण दिशा में सर रखकर सोने का प्रमुख कारण पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का मानव पर पड़ने वाला प्रभाव ही है। चूँकि चुम्बकीय किरणे उत्तरी-ध्रुव से दक्षिणी -ध्रुव की तरफ चलती है और मनुष्य के शारीर में जो चुम्बकीय क्षेत्र है वह भी सर से पैर की तरफ होता है , इसीलिए मानव के सर को उत्तरायण एवं पैर को दक्षिणायन माना जाता है । अतः यदि सर को उत्तर की और रखेंगे तो चुम्बकीय प्रभाव नहीं होगा क्योंकि पृथ्वी के क्षेत्र का उत्तरी ध्रुव मानव के उत्तरी पोल ध्रुव से रिपल्सन करेगा और चुम्बकीय प्रभाव अस्वीकार करेगा जिससे शरीर के रक्त - संचार के लिए उचित और अनुकूल चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ नहीं मिल सकेगा परिणामतः मष्तिष्क में तनाव होगा और शरीर को शांतिमय निंद्रा नहीं आएगी ।
विस्तार में लिखना संभव नहीं है अतः संक्षेप में इतना ही कहना चाहूँगा की आवासीय एवं व्यव्शायिक भवन - निर्माण करते समय यदि पांच तत्वों - आकाश , वायु , अग्नि ,जल एवं पृथ्वी - को समझकर इनका यथोचित ध्यान रखा जाये , तो ब्रह्माण्ड की अत्यंत शक्तियों का अद्भूत उपहार हमारे समस्त जीवन को सुखी एवं संपन्न बनाने में सहायक होंगे ।
*नोट :- कृपया भवन - निर्माण के पूर्व किसी अच्छे वास्तु - विशेषज्ञ से सलाह अवश्य ले लिया करें ताकि आपके भूमि / भवन में सभी दिशाओं या बिन्दुओं का वास्तविक पोजिसन का पता चल सके और आप वास्तु के सिधान्तों का पूर्ण लाभ उठा सकें - आचार्य रंजन (वास्तु सलाहाकार एवं विशेषज्ञ ),प्रोफेसर कालोनी , बेगुसराय , बिहार
Monday, May 4, 2009
* भारत में प्रमुख शनि देव के सिद्ध-स्थल *
* कोकिला वन में स्थित सिद्ध शनि मन्दिर
* ग्वालियर स्थित सिद्ध शानैश्चरा पीठ मंदिर
* चांदनी चौक (दिल्ली) स्थित शनि मंदिर
* काशी-धाम में स्थित सिद्ध शनि मंदिर
- आचार्य रंजन( ज्योतिषाचार्य & वास्तु विशेषज्ञ ), न्यू प्रोफ़ेसर कोलोनी , दिनकर नगर ,बेगुसराय (बिहार), Mob. No.: +91-9431236090 & Tel. No. : 06243-243901
Thursday, April 30, 2009
* HOT TIPS OF VAASTU *
* रीढ़ का दर्द कम करने के टोटके :यदि शयन - कक्ष की पलंग की दरी के नीचे लिखनेवाली चाक का टुकडा रख दिया जाये तो रीढ़ की हड्डी का दर्द , कमर का दर्द मिट जाएगा एवं नींद आराम से आएगी ।
* ऐश्वर्य बढ़ाने हेतु टोटका :
- मध्य-एशिया ,सिंगापूर ,बैंकॉक ,हांगकांग में प्रचलन है की लाल रंग की रिबन यदि मुख्य-प्रवेश-द्वार पर लटकाई जाए तो घर में ऐश्वर्य की वृधी होती है। - भारत में मान्यता है की आम , कनेर, पीपल , अश्वाश्था एवं अशोक वृक्ष के पत्तों का तोरण लगाकर मुख्य - द्वार पर लटकाया जाये तो घर में ऐश्वर्य की वृधी के साथ-साथ सुख -शांति की प्राप्ति होती है ।
- मध्य-एशिया ,सिंगापूर ,बैंकॉक ,हांगकांग में प्रचलन है की लाल रंग की रिबन यदि मुख्य-प्रवेश-द्वार पर लटकाई जाए तो घर में ऐश्वर्य की वृधी होती है। - भारत में मान्यता है की आम , कनेर, पीपल , अश्वाश्था एवं अशोक वृक्ष के पत्तों का तोरण लगाकर मुख्य - द्वार पर लटकाया जाये तो घर में ऐश्वर्य की वृधी के साथ-साथ सुख -शांति की प्राप्ति होती है ।
*व्यावसायिक - स्थल का नजर उतारने का टोटका :
यदि व्यापार की गति में जड़ता आ जाये तो प्रत्येक व्यवसायी को चाहिए की वो प्रत्येक शनिवार के दिन अपनी दूकान , कार्यालय अथवा प्रतिष्ठान के बाहरी स्तंभों पर निम्बू व सात हरी मिर्च बांध देना चाहिए । ये निम्बू मिर्च ऐसी जगह लगाएं , जहाँ सबकी नजर पड़े ।
* घुड़नाल अवश्य लगायें :
वास्तु-सम्बन्धी दोष की निवृति हेतु एवं घर की सुख , शांति के लिए मुख्य-द्वार पर घुड़नाल(HORSE-SHOE) अवश्य लगायें इससे शनि- ग्रह सम्बन्धी दोष की शांति होती है तथा व्यक्ति को मानसिक - तनाव से राहत मिलती है एवं उसे सुख-शांति का अनुभव होता है ।
* ज़मीन में चांदी का सर्प डालें :
नए मकान - फैक्ट्री व उद्योग को प्रारंभ करने के पूर्व भूमि-पूजन करके नींव का मुहुर्त अवश्य करना चाहिए और इस मुहुर्त में चांदी का सर्प बनाकर नींव(जमीन) में अवश्य डालना चाहिए । इससे नींव सुदृढ़ रहती है एवं मकान में कभी दरार नहीं पड़ती है तथा आपका मकान प्रकृतिक-प्रकोप से बचा रहता है ।
* शीघ्र - उन्नति हेतु मुख्य-द्वार पर केला का वृक्ष एवं तुलसी का पौधा लगायें ।
- आचार्य रंजन (ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ ) ,बेगुसराय (बिहार)
Thursday, April 23, 2009
* VERY HOT TIPS OF VAASTU *

-"आचार्य रंजन "
* धन की कमी की वजह से यदि मकान नहीं बना पा रहे हों तो उस ज़मीन पर 'रवि-पुष्य ' या 'शुक्र -पुष्य ' नक्षत्र में एक साथ दो "अनार का पौधा " ईशान क्षेत्र में लगा दें । मकान शीघ्र बन जायेगा ।
* यदि मकान बनाने के लिए धन नहीं है तो अपने ज़मीन का ' ईशान -क्षेत्र अग्रेत' कर किसी वास्तु - विशेषज्ञ के सलाह के उपरांत ज़मीन के ईशान में ही 'बोरिंग' करवा दें । इससे मकान बनने के साथ - साथ आय के नए -नए क्षेत्र भी बन जायेंगे ।
* यदि घर में कुंवारी कन्या के विवाह में विलंब हो रहा हो , तो उस कन्या का 'शयनकक्ष' वायव्य -क्षेत्र में कर दें एवं " केले के गाछ का मूल (ROOTS)" पीले धागे में बाँध कर दाहिने भुजा पर बाँध दें , विवाह तुंरत हो जायेगा ।
* कार्यालय / दूकान में उत्तरी-ईशान क्षेत्र में "मछली-घर (Acquarium)" अवश्य लगवाएं ,आय के श्रोत बढ़ जायेंगे।
* कार्यालय /दूकान में काउंटर पर "Mungoose" की विधिवत स्थापना करें । इसके प्रभाव से ग्राहक बार-बार आते हैं तथा आपके द्वारा दिया गया उधार की राशि भी स्वतः लौट आती है ।
* यदि मकान बनाने के लिए धन नहीं है तो अपने ज़मीन का ' ईशान -क्षेत्र अग्रेत' कर किसी वास्तु - विशेषज्ञ के सलाह के उपरांत ज़मीन के ईशान में ही 'बोरिंग' करवा दें । इससे मकान बनने के साथ - साथ आय के नए -नए क्षेत्र भी बन जायेंगे ।
* यदि घर में कुंवारी कन्या के विवाह में विलंब हो रहा हो , तो उस कन्या का 'शयनकक्ष' वायव्य -क्षेत्र में कर दें एवं " केले के गाछ का मूल (ROOTS)" पीले धागे में बाँध कर दाहिने भुजा पर बाँध दें , विवाह तुंरत हो जायेगा ।
* कार्यालय / दूकान में उत्तरी-ईशान क्षेत्र में "मछली-घर (Acquarium)" अवश्य लगवाएं ,आय के श्रोत बढ़ जायेंगे।
* कार्यालय /दूकान में काउंटर पर "Mungoose" की विधिवत स्थापना करें । इसके प्रभाव से ग्राहक बार-बार आते हैं तथा आपके द्वारा दिया गया उधार की राशि भी स्वतः लौट आती है ।
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Labels: वास्तुWednesday, April 22, 2009
* स्वयं जानें नींव खोदने की दिशा *

गृहारंभ में नींव खोदने के लिए राहु की दिशा का विचार परम आवश्यक होता है , क्योंकि कभी भी राहु के मुख एवं पुच्छ में नींव नहीं खोदना चाहिए । अतः सदा सर्वदा नींव की खुदाई राहु के पीठ में करना चाहिए ।
किस राशिके सूर्य में राहु का मुख , पुच्छ तथा पीठ किस दिशा में है , इसे निम्न तालिका से स्वयं जानें -
:गृहारंभ :
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सूर्य की राशि - राहू का मुख - राहू का पूछ - राहू का पीठ
....................................................................................................
सिंह,कन्या,तुला - ईशान(NE) - नैर्र्रित्य(SW) - आग्नेय (SE)
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वृश्चिक,धनु,मकर - वायव्य(NW) - आग्नेय(SE) - ईशान (NE)
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कुम्भ ,मीन,मेष - नैर्रित्य (SW) - ईशान (NE) - वायव्य (NW)
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वृष,मिथुन, कर्क - आग्नेय (SE) - वायव्य (NW) - नैर्रित्य (SW)
...............................................................................
उदाहरनार्थ: यदि आपको सिंह ,कन्या या तुला राशि के सूर्य में घर का निर्माण आरम्भ करना हो तो इस समय
चूँकि राहू का मुख ईशान (NE) में रहता है तथा राहू का पूछ नैर्रित्य (SW) में रहता है । अतः इन दिशाओं में
नींव की खुदाई न करके राहू की पीठ ,जो की आग्नेय (SE) दिशा में होता है , उसी दिशा में खुदाई या नींव देनी चाहिय ।
........आचार्य रंजन
( ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु विशेषज्ञ )
किस राशिके सूर्य में राहु का मुख , पुच्छ तथा पीठ किस दिशा में है , इसे निम्न तालिका से स्वयं जानें -
:गृहारंभ :
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सूर्य की राशि - राहू का मुख - राहू का पूछ - राहू का पीठ
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सिंह,कन्या,तुला - ईशान(NE) - नैर्र्रित्य(SW) - आग्नेय (SE)
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वृश्चिक,धनु,मकर - वायव्य(NW) - आग्नेय(SE) - ईशान (NE)
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कुम्भ ,मीन,मेष - नैर्रित्य (SW) - ईशान (NE) - वायव्य (NW)
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वृष,मिथुन, कर्क - आग्नेय (SE) - वायव्य (NW) - नैर्रित्य (SW)
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उदाहरनार्थ: यदि आपको सिंह ,कन्या या तुला राशि के सूर्य में घर का निर्माण आरम्भ करना हो तो इस समय
चूँकि राहू का मुख ईशान (NE) में रहता है तथा राहू का पूछ नैर्रित्य (SW) में रहता है । अतः इन दिशाओं में
नींव की खुदाई न करके राहू की पीठ ,जो की आग्नेय (SE) दिशा में होता है , उसी दिशा में खुदाई या नींव देनी चाहिय ।
........आचार्य रंजन
( ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु विशेषज्ञ )
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Labels: वास्तुTuesday, March 17, 2009
* वास्तु दोषों का निवारण करती है गाय *
-आचार्य रंजनजिस प्लाट पर भवन या घर का निर्माण करना हो यदि वहां पर बछड़े वाली गाय को लाकर बांधा जाए तो वहां संभावित वास्तु दोषों का स्वत: निवारण हो जाता है। कार्य निर्विघ्न पूरा होता है और समापन तक आर्थिक बाधाएं नहीं आतीं।
गाय के प्रति भारतीय आस्था को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। गो-सेवा को एक कत्र्तव्य के रूप में माना गया है। पशु रूप में गाय सृष्टिमातृका कही जाती है। गाय के रूप में पृथ्वी की करुण पुकार और विष्णु से अवतार के लिए निवेदन के प्रसंग बहुत प्रसिद्ध हैं।
‘समरांगण सूत्रधार’ जैसा प्रसिद्ध वृहद् वास्तु ग्रंथ गो रूप में पृथ्वी-ब्रrादि के समागम-संवाद से ही आरंभ होता है। वास्तुग्रंथ ‘मयमतम्’ में कहा गया है कि भवन निर्माण का शुभारंभ करने से पूर्व उस भूमि पर ऐसी गाय को लाकर बांधना चाहिए जो सवत्सा या बछड़े वाली हो।
नवजात बछड़े को जब गाय दुलारकर चाटती है तो उसका फेन भूमि पर गिरकर उसे पवित्र बनाता है और वहां होने वाले समस्त दोषों का निवारण हो जाता है। यही मान्यता वास्तुप्रदीप, अपराजितपृच्छा आदि में भी आई है। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि गाय जहां बैठकर निर्भयतापूर्वक सांस लेती है, उस स्थान के सारे पापों को खींच लेती है- निविष्टं गोकुलं यत्र श्वांस मुंचति निर्भयम्। विराजयति तं देशं पापं चास्याप कर्षति॥
गाय का घर में पालन करना बहुत लाभकारी है। ऐसे घरों में सर्वबाधाओं और विघ्नों का निवारण हो जाता है। बच्चों में भय नहीं रहता। विष्णु पुराण में कहा गया है कि जब श्रीकृष्ण पूतना के दुग्धपान से डर गए तो नंद दंपती ने गाय की पूंछ घुमाकर उनकी नजर उतारी और भय का निवारण किया। सवत्सा गाय के शकुन लेकर जाने से कार्य सिद्ध होता है।
पद्मपुराण, और कूर्मपुराण में कहा गया है कि कभी गाय को लांघकर नहीं जाना चाहिए। किसी भी साक्षात्कार, उच्च अधिकारी से भेंट आदि के लिए जाते समय गाय के रंभाने की ध्वनि कान में पड़ना शुभ है। संतान लाभ के लिए घर में गाय की सेवा अच्छा उपाय कहा गया है।
शिवपुराण व स्कंदपुराण में कहा गया है कि गो सेवा और गोदान से यम का भय नहीं रहता। गाय के पांव की धूली का भी अपना महत्व है। यह पाप विनाशक है, ऐसा गरुड़पुराण और पद्मपुराण का मत है।
पद्मपुराण, और कूर्मपुराण में कहा गया है कि कभी गाय को लांघकर नहीं जाना चाहिए। किसी भी साक्षात्कार, उच्च अधिकारी से भेंट आदि के लिए जाते समय गाय के रंभाने की ध्वनि कान में पड़ना शुभ है। संतान लाभ के लिए घर में गाय की सेवा अच्छा उपाय कहा गया है।
शिवपुराण व स्कंदपुराण में कहा गया है कि गो सेवा और गोदान से यम का भय नहीं रहता। गाय के पांव की धूली का भी अपना महत्व है। यह पाप विनाशक है, ऐसा गरुड़पुराण और पद्मपुराण का मत है।
साभार :-दैनिक भास्कर
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